मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम में 20 नाली जमीन धोखे से बेचने का आरोप, मालिक लगा रहे तहसील के चक्कर, 9 सितंबर को सुनवाई

गैरसैंण: भूमि की खरीद बिक्री को लेकर जहां उत्तराखंड सरकार सख्त कानून के दायरे में पूरी पारदर्शिता बरतने के निर्देश जारी करती रहती है, वहीं संबधित राजस्व विभाग के अधिकारियों के ढीले-ढाले रवैये के चलते जमीनी स्तर पर स्थिति इसके एकदम उलट है. गैरसैंण तहसील के मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम में लैंड फ्रॉड हुआ है. धोखे से बेची गई करीब 20 नाली जमीन के मालिक तहसील के चक्कर काटने को मजबूर हैं.

मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम में लैंड फ्रॉड का आरोप: उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के विधानसभा परिसर भराड़ीसैंण से सटे मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम सारकोट में पिछले 6 माह से लोग परेशान हैं. यहां एक युवा अपनी पुश्तैनी जमीन को बचाने के लिए अपनी प्राइवेट नौकरी को छोड़, तहसील के चक्कर लगाने को मजबूर है. आरोप है कि मामले में तहसील प्रशासन गैरसैंण शिकायतकर्ता को न्याय देने के बदले तारीख पर तारीख दिए जा रहा है.

पीड़ित ने गढ़वाल कमिश्नर से लगाई न्याय की गुहार: मामले में पीड़ित सुरेंद्र सिंह पुत्र मदन सिंह निवासी सारकोट ने बताया कि-

हमने गढ़वाल कमिश्नर को भी पत्र देकर न्याय की गुहार लगाई गई है. इससे पूर्व तहसील कार्यालय सहित क्षेत्रीय विधायक को भी शिकायती पत्र दिया गया. शिकायत पत्र के अनुसार गांव के ही व्यक्ति द्वारा इसी साल 13 मई को उनकी कुल लगभग 20 नाली पैतृक भूमि को गलत तरीके से बेचा गया था. तब मामले की भनक लगते ही उनके पिता मदन सिंह (पुत्र मकड़ सिंह) द्वारा इसकी शिकायत जमीन की रजिस्ट्री से पहले ही 6 अप्रैल को तहसील गैरसैंण में दर्ज करवा दी गई थी. इसके बावजूद जमीन को गलत तरीके से बेच दिया गया.
– सुरेंद्र सिंह, पीड़ित –

मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम सारकोट का है मामला: बताते चलें कि, मई माह में मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम सारकोट गांव के जूनियर हाईस्कूल के नजदीक कुल 50 नाली भूमि बेचे जाने का मामला प्रकाश में आया था. इसमें से 15 नाली भूमि की रजिस्ट्री एनजीओ के नाम होने के चलते निरस्त कर दी गयी थी. पीड़ित सुरेंद्र सिंह के अनुसार-

बेची गयी कुल 35 नाली भूमि में से एक जमीन बेचने वाले हरि सिंह पुत्र सिताब सिंह का वर्तमान में उक्त भूमि पर कोई भी कब्जा न होने के बावजूद, उनके पिता के हिस्से की लगभग 20 नाली भूमि बेच दी गयी. खाता खतौनी संख्या 0093 में खसरा नंबर 663, 671 व 672 उनके पिता महेंद्र सिंह के नाम पर दर्ज है, जो लगभग 12 नाली भूमि है. वहीं खसरा नंबर 664 व 668 की 8 नाली जमीन भी उन्हीं के कब्जे में है, उसे भी बेच दिया गया है.
– सुरेंद्र सिंह, पीड़ित –

14 खाताधारकों की रजामंदी नहीं होने का आरोप: सुरेंद्र ने आरोप लगाया कि भूमि विक्रय पूरी तरह से गैर कानूनी है, जिसमें भूमि बिक्री कानून का पालन नहीं किया गया है. गौरतलब है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम व उत्तराखंड जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था कानून के अनुसार संयुक्त खाते में सभी सह खाताधारकों की रजामंदी जरूरी होती है. मामले में संबंधित खाते में शामिल 14 खाताधारकों की भी रजामंदी नहीं ली गयी.

सुनवाई के लिए भटक रहा पीड़ित: मामले में 13 जुलाई 2026 को तहसीलदार को लिखित शिकायत के बाद 23 जुलाई को अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया था. लेकिन उक्त तारीख पर तहसीलदार के अन्यत्र रहने से सुनवाई नहीं हुई. इसके बाद पीड़ित परिवार 7 अगस्त को भी सुनवाई की उम्मीद में तहसील पहुंचा, लेकिन फिर भी सुनवाई नहीं हुई.

डीएम ने गठित की थी जांच समिति: मामले में जिलाधिकारी चमोली द्वारा अपर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जून माह में एक जांच समिति का गठन भी किया गया था, जिसकी रिपोर्ट अभी तक पीड़ित परिवार को नहीं दी गयी है. वहीं पीड़ित परिवार, तहसीलदार द्वारा 1 जुलाई 2026 को की गई जांच रिपोर्ट मांग रहा है, जिसे डेढ़ माह बाद भी शिकायतकर्ता को नहीं दिया जा रहा है, जो कि इस भूमि की खरीद-फरोख्त में शक की ओर भी इशारा कर रहा है.

ड़ित ने कहा ऐसे की गई गड़बड़ी: सुरेंद्र सिंह ने बताया कि-

दाखिल खारिज की प्रक्रिया के तहत तहसील द्वारा भेजे गये इश्तेहार में हरि सिंह पुत्र सिताब सिंह व महेंद्र सिंह पुत्र अषाढ़ सिंह दो अलग-अलग व्यक्तियों को एक ही नाम हरि महेंद्र पुत्र अषाढ़ सिंह दर्शाया जाना भी सरासर गलत है. लेकिन तहसील प्रशासन न तो उनकी सुन रहा है, न कोई जबाब दे रहा है.
– सुरेंद्र सिंह, पीड़ित –

खरीदारी में भू-कानून के उल्लंघन का आरोप: उल्लेखनीय है कि उक्त 35 नाली भूमि रवि चौहान पुत्र कुलदीप चौहान निवासी अल्मोड़ा व हरि सिंह पुत्र नैन सिंह निवासी बागेश्वर द्वारा खरीदी गई है. खरीदारी में भू कानून के तय मानकों का पालन हुआ या नहीं इसका खुलासा भी जिला प्रशासन ढाई माह बाद भी नहीं कर पाया है.

तहसीलदार का बयान: मामले को लेकर तहसीलदार हरीश पांडे ने बताया कि-

कानूनगो से जांच आख्या मांगी गई है. 9 सितंबर को आपत्ति की सुनवाई होनी है. उसी के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी.
– हरीश पांडे, तहसीलदार –

सूचना उपलब्ध नहीं कराने का भी आरोप: बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि तहसीलदार द्वारा क्यों पीड़ित पक्ष को सूचना उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है. जमीन की रजिस्ट्री से पूर्व पीड़ित पक्ष द्वारा राजस्व विभाग व रजिस्ट्रार को प्रार्थना पत्र देने के बावजूद कैसे जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई?

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